सौरव गांगुली — दादा: कप्तान और बल्लेबाज
सौरव गांगुली, जिन्हें फैंस प्यार से 'दादा' कहते हैं, भारतीय क्रिकेट के सबसे असरदार नेताओं और बैट्समैन में से एक हैं। ऊँची आक्रामकता और ऑफ-साइड के खूबसूरत शॉट उन्हें पहचान दिलाते हैं। कप्तानी में उन्होंने लड़खड़ाती टीम को नया आत्मविश्वास दिया और विदेशी मिट्टी पर जीत की जाए — यह उनका मकसद रहा।
कैरियर के प्रमुख मोड़
गांगुली ने 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा और जल्दी ही टीम का अहम हिस्सा बन गए। वे विशेषकर बीच के और ऊपर के क्रम में बेहतरीन प्रदर्शन करते थे। उनके समय में टीम ने कई युवा खिलाड़ियों को मौका मिला — जिनमें कुछ ने बाद में लंबा करियर बनाया। 2002 का NatWest ट्रॉफी फाइनल और लॉर्ड्स पर जश्न उनकी कप्तानी की यादगार घड़ियाँ हैं।
टेस्ट और ODI दोनों में गांगुली ने बड़ा योगदान दिया। उनके खेल की खास बात यह थी कि वे दबाव में भी शॉट खेलना जानते थे और टीम को आक्रामकता से ऊपर उठाते थे। चोटों और चयन से जुड़े विवादों के बावजूद उनका नाम भारतीय क्रिकेट की रीढ़ बना रहा।
रिकॉर्ड, शैली और विरासत
गांगुली की बल्लेबाजी में ऑफ-साइड पर कंट्रोल और कवर से बाउंड्री तक खेलने की काबिलियत साफ दिखती थी। वे लगातार बड़ी पारियां बनाकर टीम को मजबूत स्थिति में रखते थे। कप्तान के तौर पर उन्होंने टीम में आत्मविश्वास और जीत की मानसिकता लाई।
रिटायरमेंट के बाद गांगुली ने कमेंट्री, पैनल और प्रशासनिक भूमिकाओं में काम किया। 2019 में वे BCCI के अध्यक्ष बने और उस दौरान उन्होंने क्रिकेट के प्रशासन में कुछ बड़े फैसले लिए। आज भी उनके विचार और फैसले भारतीय क्रिकेट पर असर डालते हैं।
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टिप: अगर आप उनके रिकॉर्ड्स और मैच-विश्लेषण पढ़ना चाहते हैं, तो टेस्ट और ODI की अलग-अलग सूची देखें। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि दादा ने किस मौके पर टीम को किस तरह संभाला।
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सौरव गांगुली ने अपनी आत्मकथा में संजय मांजरेकर के साथ बुरे अनुभव को किया उजागर
सौरव गांगुली ने अपनी आत्मकथा 'अ सेंचुरी इज़ नॉट इनफ' में अपने प्रारंभिक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दिनों की संघर्षपूर्ण कहानी साझा की है। उन्होंने 1991-92 के ऑस्ट्रेलियाई दौरे के दौरान संजय मांजरेकर द्वारा की गई आलोचनाओं और अपमानों को याद किया है, जिसने उन्हें हिला दिया लेकिन अंततः मजबूत और अधिक दृढ़ बना दिया।