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John David 16 टिप्पणि

UGC के नए दिशा-निर्देश: उच्च शिक्षा में शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में बड़ा बदलाव

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में एक नया मसौदा जारी किया है जो उच्च शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षक नियुक्ति के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव लाता है। नए नियमों का उद्देश्य शिक्षक भर्ती प्रक्रियाओं को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों के साथ सामंजस्य बनाना है। इस दिशा में सबसे बड़ी प्रगति शिक्षकों की संविदा नियुक्तियों पर लगी सीमा को हटाना है। जिसमें पहले कुल पदों के 10% तक का प्रतिबंध था। अब यह संभव होगा कि संविदात्मक शिक्षक 'अधिकतम छह महीने की अवधि के लिए, केवल जब यह आवश्यक हो, तब नियुक्त किए जा सके। हालांकि, प्रोफेसर्स ऑफ प्रैक्टिस की संख्या कुल स्वीकृत पदों के 10% से अधिक नहीं हो सकती।

शैक्षणिक योग्यता में लचीलापन

नए दिशानिर्देशों में एक और बड़ा बदलाव यह है कि शैक्षणिक योग्यता में लचीलापन प्रदान किया गया है। उम्मीदवारों को उनके उच्चतम अकादमिक विशेषज्ञता या एनईटी/सेट योग्यता के आधार पर विषय पढ़ाने की अनुमति है, भले ही उनका पूर्व शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या हो। इसके अलावा, अकादमिक प्रदर्शन सूचकांक (एपीआई) प्रणाली जो संख्या आधारित स्कोर पर अत्यधिक निर्भर थी, उसे हटाया गया है और एक संपूर्ण मूल्यांकन प्रणाली प्रस्तुत की गई है जो नवोन्मेषी शिक्षण, शोध निधि योगदान, और डिजिटल कंटेंट निर्माण को महत्व देती है।

नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता

इसके अतिरिक्त, उप-कुलपति की नियुक्ति के लिए पात्रता मानदंड को विस्तृत किया गया है, जिससे उद्योग, सार्वजनिक प्रशासन और नीति-निर्माण जैसे क्षेत्रों के प्रतिष्ठित पेशेवरों को आवेदन करने की अनुमति मिलती है, बशर्ते उनके पास प्रमाणित अकादमिक योगदान हो। चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए फिर से डिजाइन किया गया है, जिसमें एक सर्च-कम-सेलेक्शन समिति शामिल है जो उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्टिंग और उनसे बातचीत के माध्यम से 3-5 नामों के पैनल को विजिटर या चांसलर को पेश करने का कार्य करती है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस मसौदे के परिवर्तनीय स्वरूप पर जोर दिया, कहते हैं कि यह लचीलापन, समावेशिता को बढ़ावा देता है और विविध प्रतिभाओं को पहचानता है। UGC के अध्यक्ष एम जगदीश कुमार ने जोर देकर कहा कि नए दिशानिर्देश ज्ञान और समुदाय में योगदान को कठोर योग्यता से अधिक मूल्य देते हैं। मसौदा संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया मांगता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये नियम अकादमिक आवश्यकताओं को संबोधित करते हुए नवोन्मेष, समावेश और लचीलापन को बढ़ावा दें।

समावेशिता पर विशेष ध्यान

इन नियमों में समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान भी शामिल हैं, जिसमें कला, खेल और पारंपरिक विधाओं के विशेषज्ञों की समर्पित भर्ती मार्ग शामिल है, साथ ही विकलांग व्यक्तियों के लिए भी। यहां तक कि विकलांग खिलाड़ियों को भी अब शिक्षण भूमिकाओं में आसानी से पहुंच सुनिश्चित की जाती है, जिससे एक विस्तृत और अधिक समावेशी प्रतिभा पूल सुनिश्चित होता है।

मसौदा नियम शिक्षण प्रभावशीलता, शोध आउटपुट और अकादमिक योगदान में अनुभव को प्राथमिकता देते हैं, और कर्मियों के विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करते हैं ताकि सतत् शिक्षा और कौशल संवर्धन को बढ़ावा मिल सके। ये नियम भारतीय भाषाओं के प्रयोग को अकादमिक प्रकाशनों और डिग्री कार्यक्रमों में प्रोत्साहित करते हुए शिक्षा को अधिक सुलभ और समावेशी बनाते हैं।

आयोग द्वारा गठित जाँच समिति

UGC ने नियमों के उल्लंघन की जांच के लिए एक जांच समिति का गठन किया है, और किसी भी संस्थान को जो नियमों का उल्लंघन करता पाया जाएगा, उन पर UGC योजनाओं में भाग लेने, डिग्री, ओडीएल और ऑनलाइन मोड कार्यक्रमों की पेशकश से वंचित कर दिया जाएगा। ऐसे विश्वविद्यालयों को UGC अधिनियम 1956 की धारा 2(एफ) और 12बी के तहत बनाए गए HEIs की सूची से हटा दिया जाएगा।

टिप्पणि

  • parlan caem

    जनवरी 7, 2025 AT 16:56

    parlan caem

    ये नया मसौदा तो बिल्कुल बेतुका है, जैसे कि कोई बिचारा फैंटेसी लेखक ने लिखी हो! UGC का दिमाग कहां गया, ऐसा नियम बनाते हैं जो सिर्फ शैक्षणिक अराजकता को बढ़ावा देता है। संविदा नियुक्तियों की सीमाएं हटाना तो बस हड़बड़ी में पॉलिसी बनाना है, और इससे क्वालिटी में गिरावट तो पक्की है। प्रोफेसर्स ऑफ प्रैक्टिस को 10% से अधिक नहीं कहा, फिर भी बड़े बड़े कारनामे करने की दुविधा में फँस जाते हैं। कुल मिलाकर यह निर्देश शैक्षिक मानकों को धूम्रपान कर देगा।

  • Mayur Karanjkar

    जनवरी 17, 2025 AT 15:20

    Mayur Karanjkar

    नए UGC दिशा-निर्देश अत्यधिक लचीलापन प्रदान करते हैं, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संगतता को सुदृढ़ करता है। शैक्षणिक योग्यता में विविधता को अपनाना आवश्‍यक है; यह नवाचार को प्रेरित करता है।

  • Sara Khan M

    जनवरी 27, 2025 AT 13:44

    Sara Khan M

    वाकई में, बहुत ज़्यादा बदलाव? 🤔

  • shubham ingale

    फ़रवरी 6, 2025 AT 12:08

    shubham ingale

    चलो इस बदलाव को गले लगाएँ! नई संभावनाएँ उज्ज्वल हैं 🚀

  • Ajay Ram

    फ़रवरी 16, 2025 AT 10:32

    Ajay Ram

    उच्च शिक्षा में यह नया दिशा-निर्देश वास्तव में कई आयामों को छूता है, और इस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। पहले तो संविदा पदों पर लगा 10% प्रतिबंध शैक्षणिक स्थिरता के लिए जरूरी था, लेकिन अब इसे हटाना संभावित रूप से विविधता को बढ़ावा देगा। यह परिवर्तन विशेष रूप से उन क्षेत्रों में फायदेमंद हो सकता है जहाँ उद्योग‑अभ्यास का प्रत्यक्ष अनुप्रयोग आवश्यक है, जैसे कि प्रैक्टिकल कोर्स और तकनीकी शिक्षा। फिर भी, यह प्रश्न उठता है कि क्या बिना कठोर समय सीमा के अनुबंधिक शिक्षक शिक्षण गुणवत्ता को बनाए रख पाएँगे। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सात‑छह महीने की अवधि पर्याप्त नहीं हो सकती, क्योंकि शोध‑परिचालन में निरन्तरता आवश्यक है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालयों को अब प्रोफ़ेसर्स ऑफ प्रैक्टिस की संख्या को 10% के भीतर रखते हुए मानक रखनी होगी, जो अभ्यर्थियों के चयन को और जटिल बना सकता है। शैक्षणिक योग्यता के लचीले मानदंडों के साथ, अब एनईटी/सेट योग्यता के साथ साथ विभिन्न विषयों की विशेषज्ञता को भी मान्यता दी जाएगी, जिससे बहु‑विषयक इंटरडिसिप्लिनरी कार्यक्रमों को बल मिलेगा। मूल्यांकन प्रणाली में अब केवल एपीआई स्कोर नहीं, बल्कि नवोन्मेषी शिक्षण, शोध निधि योगदान, और डिजिटल कंटेंट निर्माण को भी महत्व दिया गया है, जो कि भारत के डिजिटल शिक्षा लक्ष्य के साथ मेल खाता है। पारदर्शिता की नई प्रक्रिया में 'सर्च‑कम‑सेलेक्शन' समिति का गठन, शॉर्टलिस्टिंग के बाद व्यक्तिगत इंटरव्यू की व्यवस्था, चयन प्रक्रिया को जाँचयोग्य बनाता है। हालांकि, इस प्रक्रिया में संभावित नेटवर्किंग प्रभाव भी हो सकता है, जिससे कुछ संस्थानों को अनुकूलता मिल सकती है। समावेशिता के नए प्रावधान, जैसे कला, खेल, और पारम्परिक विधाओं के विशेषज्ञों को नियुक्ति मार्ग प्रदान करना, शैक्षणिक क्षेत्र को सामाजिक विविधता के साथ जोड़ता है। विकलांग व्यक्तियों के लिए विशेष व्यवस्था, और भारतीय भाषाओं के प्रयोग को प्रोत्साहन, इस नीति को सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से सराहनीय बनाता है। लेकिन इन सभी पहलुओं को कार्यान्वित करने में संस्थानों की तत्परता, मानव संसाधन क्षमताएँ, और वित्तीय समर्थन महत्वपूर्ण रहेगा। अंत में, यह कहा जा सकता है कि यह दिशा-निर्देश एक बहुआयामी प्रयोग है, जिसे निरन्तर निगरानी और फीडबैक की आवश्यकता होगी, जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और समावेशिता दोनों को समान रूप से बढ़ावा मिल सके।

  • Dr Nimit Shah

    फ़रवरी 26, 2025 AT 08:56

    Dr Nimit Shah

    देश की शैक्षणिक स्वाभिमत्ता को देख कर दिल गर्व से भर जाता है, लेकिन ये विदेशी उलझन वाले नियम हमारे खुद के मूल्यों को धूमिल कर रहे हैं। हम भारतीय हैं, हमारी परंपरा और राष्ट्रीय गर्व को नहीं भूलना चाहिए; ऐसे बदलाव सिर्फ पूंजीवादी एजेंडा को आगे बढ़ाते हैं।

  • Ketan Shah

    मार्च 8, 2025 AT 07:20

    Ketan Shah

    यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'सर्च‑कम‑सेलेक्शन' प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ाने के लिए कौन से मानदंड स्थापित किए जाएंगे और क्या यह वास्तव में संभावित उम्मीदवारों की विविधता को प्रतिबिंबित करेगा। इसके साथ ही, डिजिटल कंटेंट निर्माण को मूल्यांकन में शामिल करने से किस प्रकार के बेंचमार्क उपयोग किए जाएंगे, यह स्पष्ट होना चाहिए।

  • Aryan Pawar

    मार्च 18, 2025 AT 05:44

    Aryan Pawar

    बहुत बढ़िया बात है ये नया लचीलापन, इससे कई युवा प्रतिभा को मौका मिलेगा, शुभकामनाएँ

  • Shritam Mohanty

    मार्च 28, 2025 AT 04:08

    Shritam Mohanty

    क्या आप नहीं देखते कि ये नियम सरकार की छिपी हुई योजना का हिस्सा हैं? हर बार यही होता है, वे शैक्षिक संस्थानों को अपने नियंत्रण में ले लेने की कोशिश करते हैं, और आखिर में जनता का शोषण होता है।

  • Anuj Panchal

    अप्रैल 7, 2025 AT 03:32

    Anuj Panchal

    उपरोक्त राष्ट्रवादी आरोपों के बावजूद, इस नीति में प्रयुक्त मल्टी‑डिसिप्लिनरी फ्रेमवर्क और एपीआई के विकल्पात्मक मानकों को मौद्रिक एवं आकादमिक इंडेक्स के साथ संयोजित करने की आवश्यकता सिद्ध होती है। यह दृष्टिकोण नीति‑निर्धारण में एविडेंस‑बेस्ड एप्रोच को स्थापित करता है।

  • Prakashchander Bhatt

    अप्रैल 17, 2025 AT 01:56

    Prakashchander Bhatt

    चलो सकारात्मक पहलू देखेंगे, बदलाव से नई संभावनाएँ खुलेंगी, आशा रखिए!

  • Mala Strahle

    अप्रैल 27, 2025 AT 00:20

    Mala Strahle

    समाज में शिक्षा का महत्व अद्वितीय है, और ये नया UGC दिशा‑निर्देश इस बात को रेखांकित करता है कि हम कितनी विविधता को अपनाने को तैयार हैं। पहले के समय में शैक्षणिक रूप से कठोर मानदंडों ने कई प्रतिभाशाली व्यक्तियों को बाहर कर दिया, और इसी कारण से आज हम इस संतुलन की खोज में हैं। संविदा नियुक्तियों की सीमा हटाना, चाहे विवादास्पद लगे, लेकिन यह व्यावहारिक रूप से उद्योग‑अभ्यास वाले विशेषज्ञों को शिक्षण में लाने में सहायक हो सकता है। दूसरी ओर, प्रोफ़ेसर्स ऑफ प्रैक्टिस की सीमा को सीमित रखने का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थायी अकादमिक स्टाफ की उपस्थिति बनी रहे। इस दोहरी दृष्टिकोण में हमारी शिक्षा नीति का मॉडेल कई सामाजिक‑आर्थिक वर्गों को जोड़ता है। शैक्षणिक योग्यता में लचीलापन, एनईटी/सेट के अलावा विभिन्न विशेषज्ञताओं को मान्यता देता है, जिससे स्थानीय ज्ञान और पारम्परिक कारीगरों को भी मंच मिल सके। मूल्यांकन प्रणाली में नवोन्मेषी शिक्षण और डिजिटल कंटेंट को महत्व देना, डिजिटल इंडिया के साथ तालमेल बनाता है। यह नीति समावेशिता को भी बढ़ावा देती है, जिससे विकलांग व्यक्तियों और खेल‑कला विशेषज्ञों को भी उचित सम्मान मिल सके। हालांकि, यह सब सफल तभी होगा जब संस्थानों में कार्यान्वयन की तैयारी, बजट, और मानव संसाधन विकास की उचित योजना हो। नियमों के उल्लंघन पर प्रतिबंधात्मक कदम, जैसे UGC योजनाओं में भाग न लेने की सज़ा, अनुशासन बनाए रखने में मददगार हो सकते हैं, परन्तु यह भी देखना होगा कि यह सज़ा शिक्षा तक पहुँच को नहीं रोक दे। अंत में, यह कहा जा सकता है कि यह दिशा‑निर्देश एक संतुलित, समावेशी और प्रगतिशील शिक्षा प्रणाली की ओर एक कदम है, जिसे निरन्तर निगरानी और सुधार द्वारा मजबूत किया जाना चाहिए।

  • Ramesh Modi

    मई 6, 2025 AT 22:44

    Ramesh Modi

    वाकई!!! यह दिशा‑निर्देश अत्यंत महत्त्वपूर्ण है!!! लेकिन!!! हमें यह भी देखना होगा,,, कि वास्तविकता में इसका कार्यान्वयन कैसे होगा,,, और क्या इससे सभी वर्गों के शैक्षणिक हितों को समान रूप से संरक्षित किया जा सकेगा!!!

  • Ghanshyam Shinde

    मई 16, 2025 AT 21:08

    Ghanshyam Shinde

    ओह, शानदार! और अब हमें सबको इन नई ‘जादू’ नियमों से नाचना पड़ेगा।

  • SAI JENA

    मई 26, 2025 AT 19:32

    SAI JENA

    नयी नीति का उद्देश्य शैक्षणिक विविधता को बढ़ावा देना और गुणवत्ता को बनाए रखना है। इस दिशा में संस्थानों को स्पष्ट कार्य योजना और समयबद्ध तरीके से कार्यान्वयन करना आवश्यक होगा।

  • Hariom Kumar

    जून 5, 2025 AT 17:56

    Hariom Kumar

    बहुत बढ़िया! उम्मीद है कि सभी विश्वविद्यालय इस दिशा‑निर्देश को अपनाएँगे 😊

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